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निष्पक्ष पत्रकारों की कलम की आवाज पुलिसिया उत्पीड़न कर जा रही है दबायी
April 4, 2020 • ASHWANI JAISWAL • उत्तर प्रदेश

कौशांबी। सूबे में भाजपा की सरकार सत्ता में होने पर आम आदमी को भरोसा हुआ कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में रामराज की अवधारणा के तहत सबके साथ न्याय होगा लेकिन भाजपा की सरकार में अंग्रेजी हुकूमत की पुलिसिया मानसिकता के चलते दूर-दूर तक आम आदमी को न्याय मिलता नहीं दिख रहा है इतना ही नहीं पत्रकारों को भी अब न्याय मिलता नहीं दिख रहा है निष्पक्ष पत्रकारों की आए दिन कलम की आवाज पुलिसिया उत्पीड़न कर दबायी जा रही है 

हत्या बलात्कार लूट संगठित अपराध जैसी गंभीर घटनाओं पर पर्दा डालने अभिलेखों में हेराफेरी कर अभियुक्तों को बचाने की माहिर हो चुकी कौशांबी पुलिस अब सत्य बात कहने और लिखने पर सत्य के प्रहरी को ही हटा देने या कुचक्र रचकर फंसा देने की फिराक में रहती है

उत्तर प्रदेश में भाजपा की 3 साल के सरकार के कार्यकाल में जो पुलिसिया आतंक कौशाम्बी में पत्रकारों पर ढाया गया है पत्रकारों पर दहशत का माहौल कायम किया गया है सत्यता उजागर करने के लिए पत्रकारों को अनेकों यातनाएं झेलनी पड़ी है

 लेकिन पत्रकार सत्य लिखने से बाज नहीं आते हैं कौशांबी जिले में भी पत्रकारों के साथ पुलिसिया ज्यादती अत्याचार हो रही है सत्य और न्याय की कलम की आवाज लगातार दबाई जा रही है अब तक कौशांबी जिले में जुल्म ज्यादती कर पुलिस 7 पत्रकारों को जेल भेजने की कार्यवाही कर चुकी है और आए दिन पत्रकारों को जेल भेजने की धमकी दे कर कलम की आवाज दबायी जा रही है जो भाजपा सरकार पर बड़ा सवाल है

लोकतांत्रिक व्यवस्था में सामाजिक ढांचे की संरचना में चार स्तंभों में मीडिया भी एक अहम स्तंभ माना जाता है समाज में घटित होने वाली हर महत्वपूर्ण घटनाओं को उजागर करना उसे शासन सत्ता तक पहुंचाना मीडिया का दायित्व है इससे चाहे जो भी प्रभावित हो लेकिन समाज के अस्तित्व की रक्षा के लिए पत्रकारों द्वारा घटनाओं का प्रकाशन किए जाने पर तमाम लोग प्रभावित होते हैं इस बात की चिंता पत्रकार नहीं करते हैं कि कौन कौन प्रभावित हो रहा है लेकिन कौशांबी पुलिस प्रशासन नहीं चाहता कि उनकी कारगुजारी के खिलाफ खबर लिखी जाए कदाचित किसी पत्रकार ने पुलिसिया अत्याचार अन्याय की सत्य कहानी उजागर करने की जुर्रत की तो उसकी शामत आना तय है 

ताजा मामला करारी थाना क्षेत्र के अर्का पुलिस चौकी क्षेत्र का है जहां शोहदों के आतंक छेड़खानी से त्रस्त एक किशोरी ने घर के भीतर आग लगाकर आत्महत्या कर लिया इस मामले में जिन पर बालिका के साथ छेड़खानी और सताने का आरोप है उन्हें बचाने का आरोप एक भाजपा विधायक पर लग रहा था भाजपा विधायक के इशारे पर पुलिस मुकदमे में खेल कर रही थी श्याम पाल पत्रकार ने इस खबर को निष्पक्षता से सोशल मीडिया में उजागर कर दिया यही पत्रकार की निष्पक्ष कलम उसकी शामत बन गई और पुलिस ने नियम कानून की धज्जियां उड़ाते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना करते हुए तानाशाह बन कर आधी रात को पत्रकार को घर से उठा लाई और अभिलेखों में मनगढ़ंत कहानी की लिखा पढ़ी कर पत्रकार को अदालत में पेश कर दिया लेकिन लॉक डाउन के चलते सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कम सजा के अभियुक्तों को अदालत जेल से छोड़ने का हुक्म दे रही है और इस समय कम वर्ष की सजा पर पत्रकार की गिरफ्तारी पर पुलिस पत्रकार को लेकर अदालत में पहुंची तो वहां पुलिस को जमकर फटकार खानी पड़ी पुलिस की जमकर छीछालेदर हुई लेकिन बेशर्म हो चुकी पुलिस को अदालत की फटकार पर भी तनिक असर नहीं पड़ा है जिले में यदि इसी तरह पुलिसिया अत्याचार और नेताओं की कठपुतली बनकर पुलिस के काम करने की आदत में सुधार नहीं हुआ और पत्रकारों के मामले में पुलिस ने पुनरावृति की तो पत्रकारों की खामोशी टूटना तय हैं और आने वाले दिनों में उग्र रूप लेकर पत्रकार आंदोलन कर सकते हैं।